आसमान का एक टूटा तारा हु मैं,
उसे लगता हैं आवारा हु मैं,
मेरी शक्ल को तो बर्बाद तूने कर दिया,
कहती हैं बर्दाश्त करती हु, बता कैसा इल्ज़ाम हु मैं।
तेरे ही तो अक्स हैं, तुझे ही तो सिखाया था,
इश्क को मोहब्बत में तब्दील कर दिया,
सोचता हु कितना बर्बाद हु मैं।
उसे न फिक्र मेरे जंजीर की,
कैसा शख्स हैं, उसी का गुलाम हु मैं।
उसकी नाराजी मुझसे बढ़ गई,
रकीब सच्चा हैं और कैसा गुनाहगार हु मैं।
No comments:
Post a Comment