Friday, July 4, 2025

शबाब ए ग़म और हाल ए हिजरी

इतनी प्यार से तूने मुझसे क्या मांगा,
मेरे साथ रहकर तूने किसी और को मांगा,
ना कहता तो भी फर्क क्या होता,
बता क्या तू मेरे साथ होता?

कितने बुरे वक्त में तू साथ था,
मैं तेरे बिना एक मलाल था,
महसूस हुआ तुझे दूर देखकर,
मुझे छोड़ना कितना आसान था।

क्या मैं तुझे वक्त मांगता तो तू रुक जाता?
या फिर मुझे आज जैसे बेहाल कर जाता?
टवो आईना हमने साथ खरीदा था,
अब खुदको कोसता हु जब आईने में तू नजर नहीं आता।

मेरे लिए बड़ा पहाड़ हैं तू,
कैसे तुझे भूल सकता हैं तू,
किसी भी वक्त में तू मुझे दिखाई देगा,
यहीं लगता हैं जिंदगी पर मात हैं तू।

कैसे बताऊं कि तू क्या था मेरे लिए,
मेरी शायरी की महफिल था मेरे लिए,
जो तू पूछता था न किसके लिखता हु मैं,
देख आज हर अल्फ़ाज़ हैं तू मेरे लिए।

तुझे खुश देखकर मैं खुद को हारा लगता हु,
तेरे जाने के बाद मैं सपनो में जी लेता हु।
टूट जाता हु किसी रात को बेमतलब सा
तो कभी तेरी तस्वीर से गिड़गिड़ाकर माफी मांग लेता हु।

मुझे रुक जाना चाहिए ये सोचना गलत नहीं,
लेकिन तुझे भूल जाना मेरे बस में नहीं,
मैने जो खोया हैं उसका हिसाब खत्म न होगा,
तू बेशक अब कभी पास न होगा,
तू रहेगा बाहों में मेरी,
हर एक किताब में मेरी,
बरसो से सुनते आया था वक्त कम हैं,
अब क्या बचा हैं हाथों में मेरी।

सुन ना, 
मैं थक गया हूं, दवाई का नाम तू हैं,
जीने की आरजू तू हैं,
गलतियां करने की जुस्तजू तू हैं,
नमक से जख्म तू भर दे मेरे,
मेरे लिए इलाज भी तू हैं।

मैं नहीं बता सकता तुझे कैसे मेरे हालात हैं अब,
तुझे याद करू भी तो गुनाह हैं अब,
फिर भी जहन्नुम में जलने की तमन्ना हैं मेरी,
सूना हैं इश्क का आखिरी मकाम मौत हैं अब।

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